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जयन्ती पर याद किये गये महात्मा कबीर

कबीर के समाज की अवधारणा व्यापक

 कबीर बस्ती न्यूज,बस्ती। ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’ का संदेश देने वाले महात्मा कबीर को उनकी जयन्ती पर याद किया गया। गुरूवार को प्रेमचन्द्र साहित्य एवं जन कल्याण संस्थान एवं वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति की ओर  से कलेक्टेªट परिसर में संक्षिप्त गोष्ठी आयोजित कर विद्वानों ने महात्मा कबीर के विचार पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि डा. वी.के. वर्मा ने कहा कि कबीर समाज को नई दिशा देने वाले संत थे। इन्होंने समाज में व्याप्त भ्रांतियों और बुराइयों को दूर करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और लोगों में भक्ति भाव का बीज बोया। इनकी मृत्यु 1518 में मगहर में हुई थी। कबीर दास जी के दोहे अत्यंत सरल भाषा में थे, जिसके कारण इनके दोहों ने लोगों पर व्यापक प्रभाव डाला। आज भी कबीर दास जी के दोहे जीवन जीने की सही राह दिखाते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामकृष्ण लाल जगमग ने कहा कि ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय’  का संदेश देने वाले कबीर की जन मानस में गहरी पैठ है। वह स्वाभिमान से कहते हैं, ‘मैं काशी का एक जुलाहा, बूझहु मोर गियाना’ अर्थात् वह जाति-धर्म को नहीं, ज्ञान को ही सर्वोपरि मानते हैं। उन्होंने धर्मों में व्याप्त कुरीतियों के प्रति लोगों को सचेत किया। संत कबीर रामानंद के शिष्य थे। रामाननंद वैष्णव थे, लेकिन कबीर ने निर्गुण राम की उपासना की। यही कारण है कि कबीर की वाणी में वैष्णवों की अहिंसा और सूफियाना प्रेम है।
अध्यक्षता करते हुये वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्रनाथ मतवाला ने कहा कि कथनी और करनी की एकता कबीर की मूलभूत विशेषता है। कबीर जीविका (कपड़ा बुनने का कार्य) से बचे समय को सत्संग में लगाते थे। उनमें ज्ञान और कर्म का मणिकांचन संयोग था, जो आज भी अनुकरणीय है। कबीर के समाज की अवधारणा व्यापक है, जिसमें सिर्फ मनुष्य ही नहीं, जीव-जंतु और वनस्पति भी सम्मिलित हैं- ‘एक अचंभा देखा रे भाई, ठाड़ा सिंह चरावै गायी’ या ‘माली आवत देख कर कलियां करी पुकार।’ जैसे दोहों में ज्ञान का भण्डार छिपा है जो युगों तक लोगों को प्रेरणा देता रहेगा।
कार्यक्रम का संचालन करते हुये वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम प्रकाश शर्मा ने महात्मा कबीर के जीवन वृत्त पर विस्तार से प्रकाश डाला। मुख्य रूप से डा. अजीत श्रीवास्तव, नेबूलाल, सामईन फारूकी, राकेश पाण्डेय, दीनानाथ, श्रीकान्त त्रिपाठी आदि शामिल रहे।

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