श्री रामलीला महोत्सव में धनुषयज्ञ व परशुराम लक्ष्मण संवाद की लीला का हुआ मंचन,श्रद्धालु हुए मंत्रमुग्ध

कबीर बस्ती न्यूज,बस्ती।उ0प्र0।

सनातन धर्म संस्था के तत्त्वावधान में अटल विहारी वाजपेयी प्रेक्षागृह में चल रहे श्री रामलीला महोत्सव में बुधवार को धनुषयज्ञ महामहोत्सव व परशुराम लक्ष्मण संवाद की लीला का मंचन हुआ, जिसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। रामलीला को भव्य बनाने के लिये प्रेक्षागृ परिसर को अकर्षक ढंग से सजाया गया है। मंचन के दौरान सभी कलाकारों ने अपने बेहतरीन अभिनय एवं संवाद से श्रद्धालुओं की खूब वाहवाही बटोरी।

लीला मंचन के पहले यूनिक साइंस एकेडमी के बच्चों ने शिव पार्वती विवाह व लव कुश द्वारा भगवान की पूरी जीवन लीला की कथा सुनाते हुए मंचन किया गया। बच्चों की वेशभूषा और प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया और दर्शकों ने खड़े होकर ज़ोरदार तालियां बजाई। अमरमणि पांडेय, अर्चना पांडेय, इंद्रप्रकाश शुक्ल, संतोष श्रीवास्तव, कैलाश नाथ दूबे ने प्रथम आरती करने का सौभाग्य प्राप्त किया। लीला का आनन्द लेने पहुँचे इंद्रप्रकाश शुक्ल ने कहा कि भगवान राम का जीवन चरित्र अनुकरणीय है, जिन्होंने सत्य को विजय दिलाई। इस अवसर पर रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि की जयंती के अवसर पर उनके चित्र पर माल्यार्पण, पुष्पार्चन कर उनकी जयंती मनाई गई।

संस्था के सदस्य बृजेश सिंह मुन्ना ने वाल्मीकि जी के जीवन चरित्र के बारे में दर्शकों को बताया। कथा व्यास कृष्ण मोहन ने लीला को शुरू करते हुए हुये दिखाया कि लीला मंचन के प्रथम दृश्य में सीता जी के स्वयंवर में राजा जनक के आमंत्रण पर देश देशांतर के राजाओं का आगमन होता है। तब जनक स्वयंवर सभा में रखे शिवधनुष का पूजन करते हैं और बंदीजन सभा में राजा जनक का प्रण सबको सुनाते हैं कि जो भी इस धनुष पर प्रत्यंचा चढाने में सफल होगा तो उसके साथ जनकनन्दिनी का विवाह होगा। धनुषयज्ञ के आयोजन का समाचार सुनकर स्वयंवर सभा में  लंकापति रावण पहुँचता है। उधर राजा बलि के पुत्र बाणासुर को आकाशवाणी से रावण के स्वयंवर सभा में पहुँचने का समाचार मिला। वह आकर रावण से संवाद करता है।

रावण और वाणासुर के ओजस्वी संवादों को सुनकर दर्शक रोमांचित हो उठे। अंततः रावण स्वयंवर सभा को छोडकर लंका वापिस लौट जाता है और राजा जनक बाणेश का आभार ज्ञापित करते हैं। इधर जब सारे राजा धनुष पर प्रत्यंचा चढाना तो दूर बल्कि उसे तिल भर हिला तक नहीं पाते हैं तो यह देखकर राजा जनक अधीर हो उठे और करुण विलाप करते हैं। आत्मग्लानि से भरे राजा इस आशंका से भयभीत हो जाते हैं कि उनके इस कठिन प्रण के चलते सीता जी जीवन भर कुआंरी ना रह जायें। वह हताशा भरे गुस्से में आकर सबको ताना देते हैं और पृथ्वी को वीरों से खाली बता देते हैं। “जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी॥ माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें।

रदपट फरकत नयन रिसौंहें॥“ इस बात से लक्ष्मण जी क्रोधित हो जाते हैं और अपनी प्रतिक्रिया तीखे संवादों से देते हैं। तब राम जी अपने अनुज को शांत करते हैं और फिर गुरू विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम विशाल शिवधनुष भंग कर देते हैं। समूचा वातावरण जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा। हर्षोल्लास भरे वातावरण में श्रीराम और सीता जी का वरमाला कार्यक्रम संपन्न होता है और युगल छवि के दर्शन पाकर उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो गया । लोगों ने भगवान श्री राम और माता जानकी के नारे लगाये, लोगों ने खूब पुष्प वर्षा की।

वहाँ ध्यान में लीन मुनि परशुराम धनुषभंग से हुयी जोरदार आवाज सुनकर व्याकुल हो उठे और जनकसभा पहुंचे, वहाँ लक्ष्मण जी के साथ परशुराम जी का संवाद हुआ। देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥ पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥ परशुराम का भयानक वेष देखकर सब राजा भय से व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पिता सहित अपना नाम कह-कहकर सब दंडवत प्रणाम करने लगे। परशुराम और लक्ष्मण संवाद बहुत ही मनोरंजक रहा दर्शकों ने खूब तालियां बजायी। धनुषयज्ञ की लीला के समापन पर भगवान राम ने परशुराम को शिव नाम जाप के लिये भेज दिया।

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