Logo
ब्रेकिंग न्यूज़
अराजकता व अपराध के आग मे झुलस रहा है बस्ती का रेलवे स्टेशन रेलवे स्टेशन पर अवैध धन उगाही पर किया सवाल तो पत्रकार को मिली जान से मार देने की धमकी घारी मे टीनशेड के नीचे बिना पंजीकरण के चल रहा है कथित मेडिकल कालेज, तमाशबीन बना स्वास्थ्य प्रशासन सीएमओ का नटवरलाल स्टेनो अनिल चौधरी का कारनामाः 15 दिनो तक दबा कर बैठा रहा सीएमओ का जांच आदेश जब डाक्टर ही बन जाये लुटेरा फिर कैसे हो मरीजों का उचित इलाज, 6 दिन मे जांच के नाम पर वसूले 45 हजार पीसीपीएनडीटी पंजीकरण कहीं और संचालित हो रहा है कहीं और स्वास्थ्य माफियाओं को बचाने उतरा स्वास्थ्य वि... न पंजीकरण न टेक्नीशियन फिर भी विभागीय संरक्षण मे हो रहा डिजिटल एक्स-रे और ईसीजी, लूटे जा रहे निरीह म... पीसीपीएनडीटी का पंजीकरण कहीं और अल्ट्रासाउंड सेन्टर संचालित हो रहा है कहीं और, जिम्मेदार गंभीर मामलो... हीमोडायलसिस यूनिट कैली मे मरीजों के जान से हो रहा है खिलवाड, प्रशासन कुम्भकर्णी नींद मे समाज का प्रत्येक नागरिक समान अधिकारों का अधिकारीः आनन्दीबेन पटेल

जयन्ती पर याद किये गये सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

कबीर बस्ती न्यूजः

बस्ती । गुरूवार को प्रेम चन्द्र साहित्य एवं जन कल्याण संस्थान और वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति द्वारा सत्येन्द्रनाथ मतवाला और  अधिवक्ता श्याम प्रकाश शर्मा के संयोजन में वरिष्ठ साहित्यकार सर्वेश्वरदयाल सक्सेना को उनकी जयन्ती पर याद किया गया।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ चिकित्सक डा. वी.के. वर्मा ने कहा कि राजनीति पर खासे व्यंग्य और आम आदमी की पीड़ा को सीधे अंदाज में परोस देने वाले डॉ. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना बस्ती की माटी के वह रचनाकार थे, जिन्हें साहित्य जगत तीव्र आवेग और उत्तेजना का कवि मानता है। वह जन आक्रोश को सीधे शब्दों में उभार देते थे।
अध्यक्षता करते हुये सत्येन्द्रनाथ मतवाला ने कहा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितंबर 1927 को बस्ती में हुआ था। उन्होंने प्रयागराज विश्वविद्यालय से 1949 में एमए किया था। बस्ती के खैर इंटर कालेज में भी पढ़ाया, लेकिन आर्थिक परिस्थितियां दुरूह होने के चलते दिल्ली चले गए। वर्ष 1983 में कविता संग्रह खूंटियों पर टंगे लोग के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 24 सितंबर 1983 को उनकी मृत्यु हो गई। वह पराग और दिनमान के संपादक भी रहे थे। पत्रकारिता और साहित्य में उनकी पकड़ बेजोड थी। वे भले दिल्ली में रहे किन्तु उनकी रचनाओं में बस्ती के माटी की धड़कन सदैव दिखाई पड़ती है।
अधिवक्ता श्याम प्रकाश शर्मा, बीएन शुक्ल, बी.के. मिश्र ने कहा कि डॉ. सर्वेश्वर ने अपने साथ समाज को भी बदहाल देखा था। गरीबी, कुआनो और बाढ़ के भयावह दृश्य देखकर कविताओं के जरिए प्रहार किया। बाद में दिल्ली में बसे तो लौटे ही नहीं। पूछा तो बेबाकी से बोले, बस्ती का देखा-सुना सब परोस दिया। अब बस्ती बदल गई होगी, बस यही सोचकर कदम रुक जाते हैं। संचालन करते हुये डा. रामकृष्ण लाल जगमग ने कहा कि ‘नेता और गदहा’ कविता को प्रधानमंत्री मोदी ने बस्ती में वर्ष 2017 में हुई चुनावी सभा में पढ़कर विरोधियों पर कटाक्ष भी किया था। सर्वेश्वर राजनीतिक कटाक्ष से कभी नहीं डरे और इसीलिए ब्रिटिशकाल में नवीं कक्षा में स्कूल से निकाल दिए गए थे। सर्वेश्वर निजी जिंदगी में भी बेबाक थे। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि दिल्ली में बसने के बाद वह इसलिए नहीं आए कि बस्ती बदल गई होगी।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का पौत्र, प्रिंस सक्सेना,  विनय कुमार श्रीवास्तव, नीरज वर्मा ने  पं. चन्द्रबली मिश्र,  विनय कुमार मौर्य, जगदम्बा प्रसाद ‘भावुक’ मयंक श्रीवास्तव, सुधीर श्रीवास्तव ‘गोण्डवी’ भद्रसेन सिंह बंधु, दीनानाथ यादव, सन्तोष कुमार श्रीवास्तव, सामईन फारूकी आदि उपस्थित रहे।