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आसन प्राणायाम एक समग्र स्वास्थ्य संवर्धन प्रक्रिया – डॉ शची श्रीवास्तव

 बस्ती । पतंजलि  योग समिति महिला युवा प्रभारी एवं मुख्य शिक्षिका  डॉ शची श्रीवास्तव ने बताया कि आसन व्यायाम आदि के माध्यम से रोग निवृत्ति व शरीर जल संवर्धन दोनों ही संभव है, यह सभी जानते हैं। बहु प्रचलित होने पर भी योग विज्ञान की यह धारा बहुसंख्यक व्यक्तियों द्वारा सही प्रकार न तो समझी जाती है न ही व्यवहार में अपनाई ही जाती है। योग शब्द में यूं तो अक्सर मात्र दो ही हैं, किंतु इस छोटे से शब्द पर प्रभाव क्षेत्र अधिक विस्तृत है। स्थूलता से लेकर सूक्ष्म प्रक्रिया में योग की अपनी भूमिका व प्रतिक्रियाएं हैं। स्थूल व्यायाम से प्रारंभ होकर सूक्ष्म व्यायाम द्वारा चक्र-उपत्यिकाओं  पर दबाव डालने वाला यह क्रम आहार-विहार के नियमों के पालन के माध्यम से व्यक्ति को आरोग्य की स्थिति तक ले जाता है, अतः में विद्यमान जीवनी शक्ति बढ़ाता है। इस क्रम से आगे बढ़ते हुए ही वह स्थिति आती है जब व्यायाम के साथ उपासना भी जुड़  जाती है और तब वह योगसाधना बन जाती है।
    डॉ शची श्रीवास्तव ने बताया कि योग की साधना व व्यायाम इन दो शाखाओं में अंतर समझा जाना चाहिए, नहीं तो वह भ्रम हमेशा बना रहेगा जो विदेशियों को कुछ आसन, मुद्रा- बंध आदि सीखा कर महंत गणों ने साधना का पर्याय बताकर उसके मन में दृढ़ता से बिठा दिया है। योग साधना एक उच्च स्तरीय अंतरंग प्रक्रिया है जो संवेदना के धरातल पर चलती है। आत्मा और परमात्मा के मिलन की इस अद्वैत स्थिति को हाथ-पांव हिलाने डुलाने का सीमित ना मानकर उच्चस्तरीय साधनाओं का स्वरूप माना जाना चाहिए। योग व्यायाम हठयोग कि वे प्रक्रियाएं हैं जो व्यक्ति के दृश्य शरीर को तो नहीं मानवी अंतराल के प्राण शरीर जीवनी शक्ति को प्रभावित करती है। स्कूल व्यायाम- अखाड़े- जिम्नेजियम की कसरतें, दौड़ लगाना, डीप ब्रीदिंग आदि के अभ्यास दृश्य शरीर को मजबूत बनाते हैं मांसपेशियां मजबूत करते हैं व शरीर- सौष्ठव बढ़ाते हैं। इनकी भी महत्ता अपनी जगह है। पर इनमें  आसनादि, व्यायामों में काफी अंतर है। वे सूक्ष्म शरीर को प्रभावित कर अंदरूनी अंगों को प्रभावित करते व उनकी मालिश करने में सहायक सिद्ध होते हैं, जो साधारण तथा स्थूल व्यायाम – कसरतो की पकड़ में नहीं आती। आसन, मुद्रा, प्राणायाम, बंध प्रक्रिया इन्हीं में आती हैं। क्योंकि यही क्रियाएं जब उच्च स्तरीय साधना की सहयोगी बन जाती हैं, जब उन्हें ध्यान योग- भावयोग की प्रक्रिया के प्रयोजन से साधा जाता है।चित्तवृत्ति निरोध में सहायक उन साधनों के आध्यात्मपक्ष की पातंजल योगदर्शन वाली चर्चा तो “साधना से सिद्धि” ग्रंथ में की गई है व उनके संयुक्त प्रयोगों के स्वरूप को वहां विस्तार से समझाया भी गया है।

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