ब्रेकिंग न्यूज़
वाह रे स्वास्थ्य विभागं........गोरखपुर लखनउ दिल्ली से अल्ट्रासाउंड करने प्रतिदिन बस्ती आते हैं कथित ... गैंगरेप के आरोपियों को नगर पुलिस दे रही है खुला संरक्षण नशेडियों व अपराधियों के आगे नतमस्तक हुई पुरानी बस्ती पुलिस, एक माह के बाद भी नही दर्ज हुआ मुकदमा मरीजों के जीवन के लिए वरदान साबित हो रहा है मरियम हार्ट एवं मल्टीस्पेशलटी हास्पिटल इंस्पेक्टर शांशक शेखर राय ने संभाला थाना पुरानी बस्ती का कार्यभार रेलवे स्टेशन पर लोगों से मारपीट करने वाले दो अराजक तत्व गिरफ्तार अराजकता व अपराध के आग मे झुलस रहा है बस्ती का रेलवे स्टेशन रेलवे स्टेशन पर अवैध धन उगाही पर किया सवाल तो पत्रकार को मिली जान से मार देने की धमकी घारी मे टीनशेड के नीचे बिना पंजीकरण के चल रहा है कथित मेडिकल कालेज, तमाशबीन बना स्वास्थ्य प्रशासन सीएमओ का नटवरलाल स्टेनो अनिल चौधरी का कारनामाः 15 दिनो तक दबा कर बैठा रहा सीएमओ का जांच आदेश

जयन्ती पर याद किये गये सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

बस्ती में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के प्रतिमा स्थापना की मांग

कबीर बस्ती न्यूज,बस्ती।उ0प्र0।

बस्ती की धरती पर जन्में हिन्दी साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को उनके 95 वीं जयन्ती पर याद किया गया। कलेक्ट्रेट परिसर में बुधवार को प्रगतिशील लेखक संघ और वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति द्वारा आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने उनके जीवन संघर्ष और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।
शिक्षा विद डॉ. रामदल पाण्डेय ने सर्वेश्वर के कविता संसार के विविध पक्षों को रेंखाकित करते हुये कहा कि वे दिल्ली में बैठकर बस्ती को लिखते रहे , उनकी कविता कुंआनों हिन्दी संसार की अमूल्य निधि है जिसकी गूंज विश्वव्यापी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुये वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्रनाथ मतवाला ने कहा कि बस्ती  में जन्मे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक छोटे से कस्बे से अपना जीवन शुरू किया लेकिन जिन रचनात्मक उचाईयों को उन्होंने छुआ, वह अपने आप में ऐतिहासिक है। वे अपने रचनासंसार के   माध्यम से विद्रूपताओं के विरूद्ध संघर्षरत रहे। सत्येन्द्रनाथ ने मांग किया कि जनपद मुख्यालय के किसी प्रमुख स्थान पर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की प्रतिमा स्थापित कराया जाय जिससे आने वाली पीढियां उन्हें याद रखें।
संचालन करते हुये वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम प्रकाश शर्मा ने कहा कि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की लेखनी से कोई विधा अछूती नहीं रही है, कविता हो, गीत हो, नाटक हो, उपन्यास, कहानी, पत्रकारिता या फिर कोई आलेख हों, हर विधा में उनकी लेखनी चली है। उन्होने समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना योगदान दिया।  उनकी कविता ‘‘अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा, देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैं, मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं, और ढलान पर एड़ियाँ जमाकर, खड़ा होना मैंने सीख लिया है’’ जैसी अनेक रचनायें थके हारे मनुष्य को साहस देती हैं।
संगोष्ठी में मुख्य रूप से पं. चन्द्रबली मिश्र, ओम प्रकाश धर द्विवेदी, हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव, पेशकार मिश्र, हरीश दरवेश, गणेश, सन्तोष कुमार श्रीवास्तव एडवोकेट, दीनानाथ यादव, विकास शर्मा, राजेश कुमार, विनय श्रीवास्तव, कृष्णचन्द्र पाण्डेय आदि उपस्थित रहे।