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जयंती के उपलक्ष्य में याद किये गये आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

हिंदी साहित्य के कीर्ति स्तंभ हैं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

कबीर बस्ती न्यूज,बस्ती।उ0प्र0।

प्रेमचन्द साहित्य एवं जन कल्याण संस्थान द्वारा नागरिक कल्याण समिति के संयुक्त तत्वाधान में हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के जयंती उपलक्ष्य में टाउन क्लब सभागार में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। अध्यक्षता करते हुये वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्रनाथ ने कहा कि यह संयोग ही है कि आचार्य शुक्ल और उनकी जन्म तिथि एक ही दिन है। कहा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 20वीं शताब्दी के हिंदी के प्रमुख साहित्यकार थे। उन्होंने हिंदी में पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात किया। उनकी लिखी गई पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से आज भी काल निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में मदद ली जाती है। उन्होंने ‘हिंदी शब्द सागर’ के साथ ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का संपादन भी किया।
जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष एवं विचारक राजेन्द्रनाथ तिवारी ने कहा कि  कि हिंदी निबंध के क्षेत्र में रामचन्द्र शुक्ल का महत्वपूर्ण योगदान है। आलोचना के साथ-साथ अन्वेषण और गवेषणा करने की प्रवृत्ति भी उनमें थी। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ उनकी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है। निबंधों में उनकी अभिरुचि, विचारधारा अध्ययन आदि का पूरा समावेश है। वे लोकादर्श के पक्के समर्थक थे। इसकी छाप उनकी रचनाओं में सर्वत्र मिलती है। भाषा को अधिक सरल और व्यावहारिक बनाने के लिए उन्होंने तड़क-भड़क अटकल-पच्चू आदि ग्रामीण बोलचाल के शब्दों को भी अपनाया। नौ दिन चले अढ़ाई कोस, जिसकी लाठी उसकी भैंस, पेट फूलना, काटों पर चलना आदि कहावतों व मुहावरों का भी प्रयोग निःसंकोच होकर किया।
डा. रामदल पाण्डेय ने कहा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल  हिंदी साहित्य के कीर्ति स्तंभ हैं। तुलसी, सूर और जायसी जैसी निष्पक्ष और मौलिक आलोचनाएं उन्होंने प्रस्तुत की, वैसी अब तक कोई नहीं कर सका है। उनकी ये आलोचनाएं हिंदी साहित्य की अनुपम निधियां हैं। वह हिंदी के प्रथम साहित्यिक इतिहास लेखक हैं, जिन्होंने कवि-वृत्त-संग्रह से आगे बढ़कर हिंदी जगत को बहुत कुछ दिया है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य शुक्ल को हिंदी साहित्य के उन्नायकों में अति विशिष्ठ स्थान प्राप्त है। निबंधकार, समालोचक, संपादक, अनुवादक, कोषकार रूपों में हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। आचार्य शुक्ल को हिंदी के मनोवैज्ञानिक निबंध लेखन परंपरा का जनक माना जाता है। उन्होंने इतिहास लेखन की परंपरा की शुरुआत की। इस दृष्टि से उनका हिंदी-साहित्य का इतिहास आज भी विशिष्ट है।
आचार्य शुक्ल की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ ही कार्यक्रम को डा. वी.के. वर्मा, श्याम प्रकाश शर्मा, सरदार जगवीर सिंह, वीरेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि आचार्य शुक्ल के नाम पर बस्ती में विश्वविद्यालय की स्थापना होनी चाहिये। इस अवसर पर 80 वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्रनाथ मतवाला, डा. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’, अनुरोध कुमार श्रीवास्तव, जगदम्बा प्रसाद भावुक, डा. अफजल हुसेन अफजल, डा. कुलदीप सिंह, आशीष श्रीवास्तव, डॉ. राजेन्द्र सिंह राही, नीरज कुमार वर्मा, सुरेन्द्रनाथ ओझा आदि ने काव्य पाठ से वातावरण को सरस कर दिया। इन्हें अंग वस्त्र और प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में विनय कुमार श्रीवास्तव एडवोकेट, सन्तोष कुमार श्रीवास्तव, बटुकनाथ शुक्ल, पेशकार मिश्र, ओम प्रकाश धर द्विवेदी, सामईन फारूकी, पं. चन्द्रबली मिश्र, हरिस्वरूप दूबे, अजय चौधरी, राजेश मौर्य आदि उपस्थित रहे।